कब तक आरक्षण की आग में जलता रहेगा देश
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| गुरप्रीत कौर |
आरक्षण की शुरूआत देश में सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक रूप से पिछड़ी जातियों को ऊपर उठाने के लिए की गई थी।
आरक्षण जहां एक ओर कुछ लोगों के लिए वरदान है वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों के लिए अभिशाप बनता जा रहा है। इसके लागू रहते भारत का विकास होना असम्भव है। आरक्षण के विषय में कोई भी टिप्पणी करने से पूर्व ये जान लेना आवशयक है कि यह है क्या? पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित जाति के लोगों को शिक्षा तथा कौशल के क्षेत्र में सामान अधिकार दिलाने और जातिवाद को खत्म करने के लिए कोटे का प्रावधान
किया गया था। जिसमें उन्हें स्कूल, कॅालेज की फीस और नौकरी में कुछ प्रतीशत की छूट देकर आगे आने का मौका दिया जाता था,जिसे हम आज आरक्षण के नाम से जानते हैं। आरक्षण लागू करने का मुख्य कारण यह माना जाता था कि इससे देश का विकास होगा। परंतु अब आरक्षण देने प्रावधान देश के विकास में एक अरचन है।
इस समय एक सामान्य वर्ग के व्यक्ति तथा अनुसूचित जाति के व्यक्ति में कोई फर्क नहीं रह गया है। वह भी उतने ही सक्षम हैं जितने कि सामान्य जाति के लोग, तो वह आरक्षण की मंाग करके स्वंय को नीचा दिखाने का काम क्यों करते हैं। आरक्षण की शुरूआत में देश के अलग-अलग शहरों में छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया तो वहीं कुछ छात्रों ने आत्महत्या भी की। तमाम आत्महत्या और विरोधों को दरकिनार करते हुए बी पी सिंह सरकार ने देश में आरक्षण लागू किया।
वर्तमान समय की बात करें तो स्थिति इतनी भयावह है कि गुजरात, मराठा और हरियाणा में आरक्षण की मांग को लेकर सुलगता रहा है। अगर पिछले घटनाक्रम पर ध्यान दिया जाए तो हरियाणा में जाटों ने आरक्षण की मांग को लेकर उग्र प्रदर्शन किया। प्रदर्शन इतना व्यापक पैमाने पर था कि इसकी गिरफ्त में पूरा हरियाणा था। हालात बेकाबू थे। सड़क, रेल यातायात चारो तरफ से बंद था। हर तरफ अराजकता का माहौल था। लूट-पाट, महिलाओं के साथ छेड़-छाड़ और दुष्कर्म जैसी घटनाओं को सरे आम अंजाम दिया जा रहा था। स्थिति को गंभीरता से लेते हुए केन्द्र सरकार ने तत्काल सेना बुलाई और स्थिती पर काबू पाया। लेकिन कब तक आरक्षण की मांग को लेकर ऐसे उग्र प्रदर्शन और आगजनी की घटनाओं को अंजाम दिया जाएगा। यदि समय रहते इन घटनाओं से सबक नहीं लिया गया तो देश को गृह युद्ध जैसे हलातों से भी गुजरना पड़ सकता है।
यदि देखा जाए तो यह सामान्य वर्ग के लोगों के साथ अन्याय है। वह कितनी भी महनत कर लें अच्छे अंक प्राप्त कर लें यदि अनुसूचित जाति वाले के कम अंक भी है तब भी प्राथमिकता उसी को दी जाती है। आज-कल ज्यादातर डॅाक्टर, इंजीनियर, सरकारी पद पर अनुसूचित जाति के लोग हैं। कुछ तो मेहनत से पंहुचे हैं, परन्तु बाकी कोटे से। कभी किसी के मन में यह बात नहीं आयी कि कोटे की सहायता से उच्च पदों पर पंहुचने वाले लोगो के हाथों में हमारे देश की कमान है। इन्हीं पर हमारे देष का भविष्य टिका हुआ है। जो स्वंय की महनत से उन स्थानों पर नहीं पंहुच सकते वह देश का विकास कैसे करेंगे।
यदि आप एक सामान्य वर्ग के व्यक्ति से सरकारी नौकरी की बात करो तो उसका यही कहना होता है कि सरकारी नौकरी सामान्य वर्ग के लोगों के लिए नहीं है। इसका सिर्फ एक ही कारण है और वो है आरक्षण। डॅा. अम्बेडकर का कहना था कि दस साल में यह समीक्षा करनी चाहिए कि जिनकों आरक्षण दिया गया है उनकी स्थिति में सुधार हुआ है कि नहीं। आरक्षण से यदि किसी व्यक्ति का विकास हो जाता है तो उसके आगे की पीढ़ी को इस व्यवस्था का लाभ नहीं देना चाहिए। परंतु सरकार ने इस बात की कोई समीक्षा नहीं की क्योंकि सरकार अपने वोट बैंक को खोना नहीं चाहती। अब आवशयकता है आरक्षण की नई नीतियों की समीक्षा करके उन जातियों को आरक्षण से बाहर करने की, जिससे सभी को सामान अधिकार मिल सके।
किया गया था। जिसमें उन्हें स्कूल, कॅालेज की फीस और नौकरी में कुछ प्रतीशत की छूट देकर आगे आने का मौका दिया जाता था,जिसे हम आज आरक्षण के नाम से जानते हैं। आरक्षण लागू करने का मुख्य कारण यह माना जाता था कि इससे देश का विकास होगा। परंतु अब आरक्षण देने प्रावधान देश के विकास में एक अरचन है।
इस समय एक सामान्य वर्ग के व्यक्ति तथा अनुसूचित जाति के व्यक्ति में कोई फर्क नहीं रह गया है। वह भी उतने ही सक्षम हैं जितने कि सामान्य जाति के लोग, तो वह आरक्षण की मंाग करके स्वंय को नीचा दिखाने का काम क्यों करते हैं। आरक्षण की शुरूआत में देश के अलग-अलग शहरों में छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया तो वहीं कुछ छात्रों ने आत्महत्या भी की। तमाम आत्महत्या और विरोधों को दरकिनार करते हुए बी पी सिंह सरकार ने देश में आरक्षण लागू किया।
वर्तमान समय की बात करें तो स्थिति इतनी भयावह है कि गुजरात, मराठा और हरियाणा में आरक्षण की मांग को लेकर सुलगता रहा है। अगर पिछले घटनाक्रम पर ध्यान दिया जाए तो हरियाणा में जाटों ने आरक्षण की मांग को लेकर उग्र प्रदर्शन किया। प्रदर्शन इतना व्यापक पैमाने पर था कि इसकी गिरफ्त में पूरा हरियाणा था। हालात बेकाबू थे। सड़क, रेल यातायात चारो तरफ से बंद था। हर तरफ अराजकता का माहौल था। लूट-पाट, महिलाओं के साथ छेड़-छाड़ और दुष्कर्म जैसी घटनाओं को सरे आम अंजाम दिया जा रहा था। स्थिति को गंभीरता से लेते हुए केन्द्र सरकार ने तत्काल सेना बुलाई और स्थिती पर काबू पाया। लेकिन कब तक आरक्षण की मांग को लेकर ऐसे उग्र प्रदर्शन और आगजनी की घटनाओं को अंजाम दिया जाएगा। यदि समय रहते इन घटनाओं से सबक नहीं लिया गया तो देश को गृह युद्ध जैसे हलातों से भी गुजरना पड़ सकता है।
यदि देखा जाए तो यह सामान्य वर्ग के लोगों के साथ अन्याय है। वह कितनी भी महनत कर लें अच्छे अंक प्राप्त कर लें यदि अनुसूचित जाति वाले के कम अंक भी है तब भी प्राथमिकता उसी को दी जाती है। आज-कल ज्यादातर डॅाक्टर, इंजीनियर, सरकारी पद पर अनुसूचित जाति के लोग हैं। कुछ तो मेहनत से पंहुचे हैं, परन्तु बाकी कोटे से। कभी किसी के मन में यह बात नहीं आयी कि कोटे की सहायता से उच्च पदों पर पंहुचने वाले लोगो के हाथों में हमारे देश की कमान है। इन्हीं पर हमारे देष का भविष्य टिका हुआ है। जो स्वंय की महनत से उन स्थानों पर नहीं पंहुच सकते वह देश का विकास कैसे करेंगे।
यदि आप एक सामान्य वर्ग के व्यक्ति से सरकारी नौकरी की बात करो तो उसका यही कहना होता है कि सरकारी नौकरी सामान्य वर्ग के लोगों के लिए नहीं है। इसका सिर्फ एक ही कारण है और वो है आरक्षण। डॅा. अम्बेडकर का कहना था कि दस साल में यह समीक्षा करनी चाहिए कि जिनकों आरक्षण दिया गया है उनकी स्थिति में सुधार हुआ है कि नहीं। आरक्षण से यदि किसी व्यक्ति का विकास हो जाता है तो उसके आगे की पीढ़ी को इस व्यवस्था का लाभ नहीं देना चाहिए। परंतु सरकार ने इस बात की कोई समीक्षा नहीं की क्योंकि सरकार अपने वोट बैंक को खोना नहीं चाहती। अब आवशयकता है आरक्षण की नई नीतियों की समीक्षा करके उन जातियों को आरक्षण से बाहर करने की, जिससे सभी को सामान अधिकार मिल सके।
लेखक मौजूदा समय में पत्रकारिता की छात्रा हैं |


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